भारत में IIT का सपना हर छात्र देखता है, लेकिन जब कोई छात्र IIT-JEE में AIR 1 लाता है तो उससे उम्मीद की जाती है कि वो Silicon Valley जाएगा और करोड़ों का पैकेज लेगा। साल 2000 के टॉपर नितिन गुप्ता ने लेकिन ये पूरी परिभाषा ही बदल दी।
कहां से शुरू हुई कहानी
नितिन गुप्ता ने IIT-JEE 2000 में ऑल इंडिया रैंक 1 हासिल की। इसके बाद उन्होंने IIT कानपुर में Computer Science and Engineering में एडमिशन लिया और 2004 में http://B.Tech की डिग्री पूरी की। IT कानपुर में पढ़ाई के दौरान ही उनका इंटरेस्ट धीरे-धीरे कंप्यूटर कोड से निकलकर जीव विज्ञान की तरफ जाने लगा। उन्हें समझना था कि कंप्यूटर तो इंसान ने बनाया, लेकिन इंसान का दिमाग कैसे काम करता है? इसी सवाल ने उन्हें अमेरिका पहुंचा दिया। उन्होंने University of California, San Diego (UCSD) से Bioinformatics and Systems Biology में PhD किया और 2009 में अपनी डॉक्टरेट पूरी की। उनका PhD वर्क प्रोटीन और जीनोम पर आधारित था - यानी कंप्यूटर और बायोलॉजी का मेल। PhD के बाद वो रुके नहीं। उन्होंने UCSD की ही Cognitive Neuroscience Lab में कुछ महीने काम किया, जहां उन्होंने स्टडी की कि खाने या पैसों की इच्छा इंसान के एक्शन में कैसे बदलती है। 2010 से 2014 तक उन्होंने अमेरिका के प्रतिष्ठित National Institutes of Health (NIH) में Postdoctoral Researcher के तौर पर electrophysiology पर काम किया।
'स्वदेश' मोमेंट और भारत वापसी
कहानी में ट्विस्ट तब आया जब विदेश में सेटल होने के बाद उन्होंने शाहरुख खान की फिल्म 'स्वदेश' देखी। नितिन खुद कई इंटरव्यू में बता चुके हैं कि उस फिल्म ने उन्हें सोचने पर मजबूर किया कि अपनी रिसर्च अपने ही देश में क्यों न की जाए। और जुलाई 2014 में उन्होंने फैसला ले लिया - अमेरिका छोड़कर वापस IIT कानपुर आ गए। उसी कैंपस में, जहां वो 2000 में एक स्टूडेंट के तौर पर आए थे, अब वो Professor के तौर पर लौटे। फिलहाल वो IIT कानपुर के Biological Sciences and Bioengineering विभाग में प्रोफेसर हैं और Joy Gill Chair पर हैं।
अब कर रहे हैं मच्छरों के दिमाग पर रिसर्च
सुनने में अजीब लगता है - JEE टॉपर और मच्छर का दिमाग? लेकिन यही उनकी लैब का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट है।IIT कानपुर में उनकी लैब का नाम है - Sensory Systems Lab। यहाँ वो ये समझने की कोशिश करते हैं कि छोटा सा दिमाग भी गंध को कैसे पहचानता है और उसी से व्यवहार तय करता है। उनकी टीम मुख्य रूप से तीन कीड़ों पर काम करती है - टिड्डे, फल मक्खी और सबसे जरूरी, Aedes aegypti मच्छर जो डेंगू, जीका और चिकनगुनिया फैलाता है। लैब में electrophysiology, histology, genetic manipulation और computational modelling जैसी तकनीकों से रिसर्च होती है।
उनकी रिसर्च के दो बड़े सवाल हैं:
1. मच्छर इंसानों की गंध को हजारों गंधों के बीच कैसे पहचान लेता है?
2. खून पीने से पहले और बाद में उसके दिमाग का सर्किट कैसे बदल जाता है?
2023 में Nature Communications में छपी उनकी स्टडी ने एक बड़ी खोज की थी। अब तक माना जाता था कि मच्छर के दिमाग में हर गंध के लिए एक अलग न्यूरॉन होता है, लेकिन नितिन की टीम ने दिखाया कि मच्छर का दिमाग 'combinatorial coding' इस्तेमाल करता है - मतलब कई न्यूरॉन्स मिलकर एक गंध को कोड करते हैं।
क्यों जरूरी है ये रिसर्च?
अगर हमें पता चल जाए कि मच्छर इंसान को कैसे ढूंढता है, तो हम ऐसी तकनीक बना सकते हैं जो मच्छर को इंसान से दूर रखे। इससे बिना कीटनाशक के मच्छरों से होने वाली बीमारियों को रोका जा सकता है। नितिन गुप्ता को उनके काम के लिए National Bioscience Award और कई अन्य सम्मान मिल चुके हैं। उनकी कहानी आज के JEE aspirants को एक नया नजरिया देती है - टॉप करना ही आखिरी मंजिल नहीं है, असली मंजिल वो है जहां आपका curiosity आपको ले जाए।

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