चौपारण (हजारीबाग) : सरकारी विद्यालयों के शिक्षकों पर लगातार बढ़ रहे गैर-शैक्षणिक कार्यों का असर अब शिक्षा व्यवस्था पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। जिन शिक्षकों की प्राथमिक जिम्मेदारी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना है, वे आज विभिन्न सरकारी अभियानों, सर्वेक्षणों और प्रशासनिक कार्यों के निर्वहन में व्यस्त हैं। ऐसे में विद्यालयों में नियमित पठन-पाठन प्रभावित होने की चिंता भी बढ़ती जा रही है।विगत कई वर्षों से शिक्षकों को जनगणना, चुनाव संबंधी कार्य, विभिन्न सरकारी सर्वेक्षण, दस्तावेज सत्यापन अभियान तथा अन्य प्रशासनिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करना पड़ रहा है। वर्तमान में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर-2026) जैसे महत्वपूर्ण कार्यों में भी शिक्षकों की व्यापक भागीदारी सुनिश्चित की गई है। इसके कारण अनेक शिक्षक विद्यालय में उपस्थिति दर्ज कराने के बाद आवश्यक दस्तावेजों के साथ गांव-गांव जाकर सरकारी कार्यों का निर्वहन कर रहे हैं। इसका सीधा प्रभाव विद्यालयों की शैक्षणिक गतिविधियों पर पड़ रहा है।कई सरकारी विद्यालय समिति शिक्षकों के भारी संवेदनशीलता हो रही है। जहां एक ही शिक्षक को एक साथ कई कक्षाओं का संचालन करना पड़ता है। पठन-पाठन के साथ-साथ विद्यालयों के अनुसार, कन्वर नॉन-शिक्षियों और मध्याह्न भोजन जैसी व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी भी विद्यालय के शेष शिक्षकों पर आ जाती है।
कई स्थानों पर अधिकांश शिक्षकों के दिनभर विद्यालय से बाहर रहने के कारण बच्चों को अनिवार्य शैक्षणिक मार्गदर्शन नहीं मिल पाता, जिससे उनकी पढ़ाई प्रभावित हो रही है।शिक्षकों का कहना है कि वे सरकार द्वारा सौंपे गए सभी दायित्वों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहते हैं, लेकिन लगातार बढ़ रहे गैर-शैक्षणिक कार्यों के कारण उनका अधिकांश समय कक्षा के बजाय प्रशासनिक जिम्मेदारियों के निर्वहन में व्यतीत हो रहा है। उनका मानना है कि यदि शिक्षा की गुणवत्ता में अपेक्षित सुधार लाना है तो शिक्षकों को अधिकतम समय विद्यार्थियों के बीच शिक्षा कार्य के लिए उपलब्ध कराना जाना चाहिए।हालांकि यह भी स्वीकार किया जाता है कि हर व्यवस्था में कुछ असावधानियां होती हैं, लेकिन उनके आधार पर पूरे शिक्षक समाज को आलोचना उचित नहीं है। भागीदारी के समावेशी और उद्देश्य न कि यह सरकार के पास प्रशासनिक कार्य जितने हैं, उन्हें कार्य माध्यम से पूर्ण करें। लेकिन इसके साथ-साथ बच्चों की पढ़ाई की सर्वोत्तम पद्धतियां मिलनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि विद्यालयों की शिक्षा किसी भी परिस्थिति में प्रभावित नहीं होनी चाहिए। सरकार को ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए, जिससे गैर-शैक्षणिक कार्यों के कारण विद्यालयों में पठन-पाठन बाधित न हो और शिक्षकों को अधिक से अधिक समय शिक्षा कार्य के लिए उपलब्ध कराया जा सके। क्योंकि शिक्षा जागरूकता का भी मानना है कि सरकारी योजनाओं और प्रशासनिक अभिलेखों के लिए अलग तंत्र उपलब्ध होने के बावजूद यदि प्रत्येक महत्वपूर्ण कार्य में शिक्षकों की ही आवश्यकता समझी जाएगी तो बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना ही इसका प्रयास की गुणवत्ता की पहचान है। ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षकों के समय और ऊर्जा का अधिकतम उपयोग शिक्षण कार्य में हो, ताकि विद्यालयों का मूल उद्देश्य - बेहतर शिक्षा, गुणवत्तापूर्ण पठन-पाठन और विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास - सुनिश्चित किया जा सके।

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