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अब गंभीर चोटों में नहीं काटना पड़ेगा अंग, RIMS रांची के डॉक्टरों ने 80,000 में तैयार की स्वदेशी डिजिटल डिवाइस

रांची: झारखंड के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल RIMS रांची ने चिकित्सा के क्षेत्र में एक बड़ी कामयाबी हासिल की है। यहां के ऑर्थोपेडिक विभाग के डॉक्टरों ने एक ऐसी स्वदेशी डिजिटल डिवाइस तैयार की है, जो सड़क हादसों और गंभीर फ्रैक्चर में मरीजों का हाथ-पैर कटने से बचाएगी। विदेशों में इस तरह की डिवाइस की कीमत 5 से 6 लाख रुपये तक होती है, जबकि RIMS के डॉक्टरों ने इसे मात्र 80,000 रुपये में तैयार कर दिया है। यह पूरी तरह से मेड इन इंडिया और कम लागत वाली तकनीक है।

क्या होता है कम्पार्टमेंट सिंड्रोम?

डॉक्टरों के मुताबिक सड़क दुर्घटना में जब पैर कुचल जाता है, भारी मलबे में हाथ दब जाता है या किसी गंभीर फ्रैक्चर के बाद, तो मांसपेशियों के अंदर खून और फ्लूइड भरने से अंदरूनी दबाव (Compartment Pressure) लगातार बढ़ने लगता है। इसे मेडिकल भाषा में कम्पार्टमेंट सिंड्रोम कहते हैं। अगर समय पर इस दबाव का पता न चले तो नसों में खून की सप्लाई बंद हो जाती है और मांसपेशियां सड़ने लगती हैं। ऐसी स्थिति में डॉक्टरों के पास अंग काटने (Amputation) के अलावा कोई चारा नहीं बचता। अब तक सरकारी अस्पतालों में दबाव नापने के लिए कोई सटीक डिजिटल उपकरण नहीं था। डॉक्टर हाथ से अंदाजा लगाते थे, जिसमें काफी समय बर्बाद हो जाता था और मरीज की जान व अंग दोनों खतरे में पड़ जाते थे।

RIMS की डिवाइस कैसे काम करेगी?

RIMS की यह नई डिजिटल डिवाइस कुछ ही सेकंड में मांसपेशी के अंदर का सटीक दबाव बता देगी। इसमें एक पतली सुई और डिजिटल सेंसर लगा है, जो सीधे मॉनिटर पर प्रेशर की रीडिंग दिखाता है।

- अगर दबाव 30 mmHg से ज्यादा है तो तुरंत ऑपरेशन (फैसियोटॉमी) करने का अलर्ट मिलेगा।

- अगर दबाव सामान्य है तो बिना ऑपरेशन के दवा से इलाज संभव होगा।

इससे डॉक्टरों को यह फैसला लेने में आसानी होगी कि मरीज को तत्काल ऑपरेशन की जरूरत है या नहीं।

गरीबों के लिए वरदान

RIMS प्रबंधन का कहना है कि इस डिवाइस के आने से अब ट्रॉमा सेंटर में आने वाले गरीब मरीजों को प्राइवेट अस्पतालों के महंगे टेस्ट पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। पहले एक जांच के लिए 10-15 हजार खर्च होते थे, अब यह जांच RIMS में ही बहुत कम खर्च में हो सकेगी। इस डिवाइस को RIMS के ऑर्थो विभाग की टीम ने कई महीनों के रिसर्च के बाद तैयार किया है। जल्द ही इसका ट्रायल सफल होने के बाद इसे झारखंड के सभी मेडिकल कॉलेजों और जिला अस्पतालों में भी उपलब्ध कराने की योजना है। यह आविष्कार न सिर्फ झारखंड बल्कि पूरे देश के सरकारी अस्पतालों के लिए गेम चेंजर साबित हो सकता है।

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