गाँव की कच्ची सड़क पर बैलगाड़ी की तस्वीर में देखा गया - ना ट्रैक्टर बड़ी शान, ना सूट-बूट का अभिमान | सम्मान के हकदार हैं लुंगी-बनियान

 कृष्णा कुमार कुशवाहा

दैहर (चौपारण)। जहां बड़े-बड़े शहरों की चकाचौंध में गांव की खबरें दम तोड़ देती हैं, वहीं एक जागरूक पत्रकार की नजर ने दैहर की कच्ची सड़क पर खड़े तीन मेहनतकशों में "असली भारत" को खोज निकाला। ये तस्वीर सिर्फ एक क्लिक नहीं, गांव के सम्मान का दस्तावेज है।

तस्वीर का सच, पत्रकार की नजर  

बीच में लुंगी-बनियान में खड़े, बैल की रस्सी थामे ये बुजुर्ग कोई आम आदमी नहीं - ये अन्नदाता हैं। इनके चेहरे की झुर्रियों में 40 साल की खेती का इतिहास लिखा है। बाएं कंधे पर गमछा डाले खड़े किसान की आंखों में उस मेहनत की चमक है जो फसल उगाती है। दाएं शर्ट-पैंट में खड़े सज्जन बताते हैं कि पढ़-लिखकर भी अपनी मिट्टी को कोई नहीं भूलता।
पत्रकार ने जब इस "सगड़ गाड़ी" को कैमरे में कैद किया, तो सिर्फ फोटो नहीं खींची - गांव के स्वाभिमान को फ्रेम में जड़ दिया। आज जब टीवी पर सिर्फ नेताओं के बयान और शहरों की खबरें चलती हैं, तब एक ग्रामीण पत्रकार ने दिखा दिया कि असली हीरो तो ये बैल हांकने वाले हैं।
दो बैल, एक विरासत लाल और सफेद बैल किसी मर्सिडीज से कम नहीं। बिना डीजल, बिना EMI के ये 365 दिन गांव की अर्थव्यवस्था ढोते हैं। पीले तिरपाल के नीचे ढका सामान भले ही लाखों का ना हो, पर जिस ईमानदारी से कमाया गया है वो करोड़ों में एक है।
समाज का आईना बिजली के तार आ गए, पर पक्की सड़क का इंतजार आज भी है। फिर भी चेहरे पर शिकन नहीं, गर्व है। ये वो लोग हैं जो शिकायत नहीं करते, समाधान बनते हैं। दाएं दिखती झोपड़ी "आत्मनिर्भर भारत" की वो यूनिवर्सिटी है जहां डिग्रियां नहीं, संस्कार मिलते हैं। पत्रकारिता का धर्म, गांव का मान । इस तस्वीर को खोजकर पत्रकार ने साबित कर दिया कि खबर AC कमरों में नहीं, धूप में तपती सड़कों पर मिलती है।

लुंगी-बनियान वाले ये किसान किसी VIP से कम नहीं। देश का पेट भरने वाले का कद सबसे ऊंचा होता है। "सगड़ गाड़ी" को तस्वीर में लाकर पत्रकार ने लुप्त होती संस्कृति को इतिहास के पन्नों में दर्ज कर दिया।
जब संसद में 5 ट्रिलियन इकोनॉमी के भाषण होते हैं, तब दैहर की ये बैलगाड़ी बताती है कि असली GDP तो इन बैलों की चाल से नापी जाती है। एक पत्रकार की कलम और कैमरा जब गांव के सम्मान के लिए चलता है, तो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ और मजबूत होता है।
सलाम है उस पत्रकार को जिसने VIP की जगह किसान को फ्रेम में रखा। सलाम है उन ग्रामीणों को जो बिना शोर के देश की नींव मजबूत कर रहे हैं।
"ना सूट-बूट का घमंड, ना पैसे का अभिमान| मेहनत की लुंगी-बनियान ही असली हिंदुस्तान दैहर में पत्रकार के कैमरे ने कैद किया गांव का स्वाभिमान।"