Hot Posts

6/recent/ticker-posts

Chauparan VidhanSabha: कभी इटखोरी से सिमरिया तक था राज, अब इतिहास बना चौपारण विधानसभा



कृष्णा कुमार कुशवाहा 

चौपारणः (हजारीबाग) आज का चौपारण भले ही बरही विधानसभा क्षेत्र का हिस्सा है, लेकिन कभी चौपारण खुद एक पूर्ण विधानसभा क्षेत्र हुआ करता था। उस दौर में चौपारण की राजनीतिक सीमा आज की तुलना में कहीं अधिक विस्तृत थी। इटखोरी, मयूरखंड और सिमरिया बक्षेत्र के कुछ हिस्सों तक चौपारण विधानसभा का राजनीतिक प्रभाव फैला हुआ था। यानी उस समय चौपारण सिर्फ एक प्रखंड या क्षेत्र नहीं, बल्कि एक बड़ा विधानसभा क्षेत्र था, जहां से चुना गया विधायक कई अलग-अलग इलाकों की जनता का प्रतिनिधित्व करता था।

1952 से लेकर 1972 तक चौपारण की अपनी अलग विधानसभा सीट रहीं। इस लंबे दौर में चौपारण की राजनीति ने कई उतार-चढ़ाव देखे और कई नेताओं ने यहां से चुनाव लड़कर विधानसभा तक का सफर तय किया। यह वह समय वा जब आज के चौपारण, इटखोरी, मयूरहंड और सिमरिया के कुछ हिस्सों की राजनीतिक आवाज एक ही विधानसभा क्षेत्र के जरिए विधानसभा तक पहुंचती थी। चौपारण की सियासत का वह दौर, जब दो नामों की थी चचर्चा

चौपारण विधानसभा के इतिहास में निरंजन प्रसाद सिंह 'बाबू' और नंद किशोर सिंह का दौर बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। दोनों नेताओं की जड़े इटखोरी प्रखंड से जुड़ी थीं, लेकिन चौपारण विधानसभा की राजनीति में दोनों की अपनी अलग पहचान थी। 1967 में निरंजन प्रसाद सिंह 'बाबू चौपारण विधानसभा से विधायक निर्वाचित हुए। उस समय उनकी राजनीतिक पकड़ चौपारण क्षेत्र में काफी मजबूत मानी जाती थी। चौपारण की जनता के बीच उनकी अलग पहचान थी और उन्हें लीग प्यार से 'बाबू' कहकर पुकारते थे। 

इसे भी पढ़ें : Jharkhand SIR Update: झारखंड में वोटर लिस्ट से हटाए जाएंगे 10.56 लाख नाम, गणना फॉर्म भरने की प्रक्रिया जारी

इसके बाद 1972 में नंद किशोर सिंह चौपारण विधानसभा से विधायक बने। इस चुनाव के साथ चौपारण की राजनीति में एक नया अध्याय जुड़ा। नंद किशोर सिंह का राजनीतिक आधार इटखोरी क्षेत्र से जुड़ा था और वे भी इसी बड़े चौपारण विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे। इस तरह 1967 और 1972 के चुनाव चौपारण विधानसभा के राजनीतिक इतिहास में विशेष महत्व रखाते हैं। एक चुनाव में निरंजन प्रसाद सिंह 'बाबू और अगले चुनाव में नंद किशोर सिंह दोनों नेताओं ने चौपारण विधानसभा का प्रतिनिधित्व किया।


'बाबू' निरंजन प्रसाद सिंह

"1967 में निरंजन प्रसाद सिंह 'बाबू' और 1972 में नंद किशोर सिंह बने विधायक, फिर परिसीमन ने बदल दिया पूरा चुनावी नक्शा"

विष्णु खिरमोहन था राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र उस दौर की चौपारण की राजनीति को याद करते हुए विष्णु खिरमोहन का जिक्र भी महत्वपूर्ण हो जाता है। आज से कई दशक पहले जब राजनीति के लिए सोशल मीडिया, मोबाइल फोन और डिजिटल प्लेटफॉर्म नहीं थे, तब राजनीतिक चर्चाएं आमने-सामने बैठकर होती थीं। विष्णु खिरमोहन उस समय राजनीतिक गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता था। वहां क्षेत्र के नेता, कार्यकर्ता और राजनीति में रुचि रखने वाले लोग जुटते थे।

 चुनावी रणनीति से लेकर क्षेत्र की राजनीति के भविष्य तक पर चर्चा होती थी। कहा जाता है कि उस दौर में राजनीति से जुड़े किसी व्यक्ति को तलाशना हो तो विष्णु खिरमोहन पहुंचना काफी था। यहां होने वाली चर्चाओं में चौपारण के साथ-साथ इटखोरी, मयूरहेड और आसपास के क्षेत्रों की राजनीति भी शामिल रहती थी। यहीं वह दौर था जब चौपारण विधानसभा सिर्फ चुनाव लड़ने की जगह नहीं, बल्कि पूरे इलाके की राजनीतिक गतिविधियों का बड़ा केंद्र हुआ करता था। फिर आया परिसीमन और बदल गया चौपारण का राजनीतिक नक्शा

इसे भी पढ़ें : HAZARIBAGH NEWS : चौपारण पंचायत के केबीएसएस उच्च विद्यायलय में मतदाता सूची पुनरीक्षण को लेकर BLO की अहम बैठक हुई संपन्न

1972 के चुनाव के बाद देश में राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं। 1975 में आपातकाल लागू हुआ और 1977 में बिहार विधानसभा के चुनाव हुए। इसी व्यापक राजनीतिक दौर के बीच विधानसभा क्षेत्रों का पुनर्गठन और परिसीमन भी हुआ। परिसीमन के बाद चौपारण की पुरानी विधानसभा पहचान समाप्त हो गई। चौपारण क्षेत्र को बरही विधानसभा के साथ जोड़ दिया गया। दूसरी और सिमरिया को अलग विधानसभा क्षेत्र के रूप में नई पहचान मिली और इटखोरी क्षेत्र भी उसके राजनीतिक भूगोल का हिस्सा बना। इस बदलाव के साथ चौपारण विधानसभा का वह पुराना राजनीतिक नक्शा इतिहास बन गया, जिसमें कभी इटखोरी, मयूरखंड और सिमारिया के कुछ हिसो भी शामिल थे।



'बाबू'नन्द किशोर सिंह

चौपारण विधानसभा खत्म हुई, लेकिन सियासत की विरासत जारी रही

चौपारण की अलग विधानसभा सीट समाप्त होने के बाद यहां की राजनीति का केंद्र बरही विधानसभा बन गया। लेकिन चौपारण की राजनीतिक पहचान और यहां के नेताओं का प्रभाव खत्म नहीं हुआ। निरंजन प्रसाद सिंह 'बाबू' इसका सबसे बड़ा उदाहरण बने। 1967 में चौधारण विधानसभा से विधायक बनने वाले निरंजन प्रसाद सिंह ने परिसीमन के बाद 1980 में बरही विधानसभा से चुनाव जीतकर फिर विधानसभा में वापसी की। यानी जिस नेता ने कभी चौपारण विधानसभा का प्रतिनिधित्व किया था, वहीं बाद में बदले हुए राजनीतिक नक्शे में बरही विधानसभा का प्रतिनिधि बना।

 इस तरह निरंजन प्रसाद सिंह 'बाबू' की राजनीतिक यात्रा चौपारण विधानसभा के पुराने इतिहास और बरहीं विधानसभा के नए राजनीतिक दौर के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी बन गई। चौपारण की विधानसभा सीट आज इतिहास का हिस्सा है, लेकिन उस दौर की राजनीतिक यादें आज भी इलाके के बुजुर्गोंों की बातचीत में जीवित है। कभी इटखोरी से लेकर सिमरिया के हिस्सों तक फैला चौपारण विधानसभा क्षेत्र, 1967 में निरंजन प्रसाद सिंह 'बाबू' की जीत, 1972 में नंद किशोर सिंह का विधायक बनना और फिर परिसीमन के बाद चौपारण का बरही में शामिल होना-वह पूरा सफर क्षेत्र के बदलते राजनीतिक इतिहास की एक महत्वपूर्ण कहानी है।

Post a Comment

0 Comments