• वन पट्टा के नाम पर वन का सौदा : चौपारण में सरकार की आँखों के सामने उजड़ रहा है जंगल, मौन है वन विभाग
• हाथी-बाघ-हिरण का घर छिना, आदिवासी के अधिकार की आड़ में भू-माफिया का राज, और सत्ता की चुप्पी सबसे बड़ा अपराध
कृष्णा कुमार कुशवाहा
चौपारण हजारीबाग : यह वन पट्टा है या वन के विनाश का सरकारी पट्टा? प्रश्न कठोर है, परन्तु चौपारण के उजड़ते वनों को देखकर यही प्रश्न मुखर होता है। कभी जो चौपारण अपनी सघन हरियाली, शाल-सागौन के गगनचुंबी वृक्षों और हाथी, बाघ, हिरण जैसे वन्य जीवों की किलोल के लिए जाना जाता था, आज वहाँ आरे की ध्वनि गूँज रही है। वन अधिकार अधिनियम, जो वंचित आदिवासी को उसका नैसर्गिक अधिकार देने के पवित्र उद्देश्य से बना था, आज उसी अधिनियम की आड़ में वन-भूमि को निर्ममता से साफ किया जा रहा है। यह कैसा अधिकार है जहाँ पेड़ कटते हैं और जमीन बिकती है? यह कैसी नीति है जहाँ जंगल का पट्टा मिलते ही जेसीबी गरजने लगती है? प्रकृति पर प्रहार, सत्ता का मौन.
स्थानीय ग्रामीणों का स्पष्ट आरोप है -
पिछले दो माह से दिन-रात सैकड़ों साल, शीशम और महुआ के वृक्षों को काटकर ट्रकों में भरा जा रहा है। वन भूमि का स्वरूप बदल दिया गया है। वन्य जीव, जिनका यह घर था, अब भोजन और जल की खोज में गाँवों की ओर भागने को विवश हैं। यह केवल पेड़ों की कटाई नहीं, यह एक पूरे पारिस्थितिक तंत्र की हत्या है। जब जंगल उजड़ेगा, तो जंगली जानवर खेतों में आएगा, किसान की फसल रौंदेगा,और फिर मानव-वन्यजीव संघर्ष के नाम पर निर्दोष जानवर मारा जाएगा। दोष किसका होगा? सरकार की अदूरदर्शिता का।
विचारणीय प्रश्न -
सरकार जवाब दे चौपारण में कितने वन पट्टों का भौतिक सत्यापन हुआ है? क्या सरकार के पास इसका कोई लेखा-जोखा है? पट्टा मिलने के बाद उस भूमि पर वृक्षों की कटाई की अनुमति किसने दी? वन विभाग सो रहा था या मिला हुआ था? जब लाखों रुपये वन संरक्षण और पर्यावरण सुरक्षा के नाम पर खर्च दिखाए जाते हैं, तो धरातल पर हरियाली घट क्यों रही है और उजड़ा क्षेत्र बढ़ क्यों रहा है? यह लापरवाही नहीं, यह आपराधिक साजिश है। सत्ता के संरक्षण में उजड़ता है जंगल यदि आज भी कार्रवाई केवल कागजी खानापूर्ति और तीन सदस्यीय समिति के गठन तक सीमित रही, तो इतिहास इस सरकार को कभी क्षमा नहीं करेगा। आज पेड़ कट रहे हैं, कल पूरा जीवन-तंत्र खत्म हो जाएगा। जंगल केवल लकड़ियों का समूह नहीं है, वह वन्य जीवों का घर, जल का स्रोत और जलवायु का रक्षक है।
युवा सोच का स्पष्ट मानना है -
दोषी कोई भी हो, चाहे वह कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उस पर कठोरतम कार्रवाई होनी चाहिए। अन्यथा यह मान लिया जाएगा कि वन विभाग की निष्क्रियता नहीं, बल्कि उसकी सहमति से चौपारण के जंगल नीलाम हो रहे हैं।
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